कुछ इस तरह आपके बच्चो का काटा जाएगा 🙂

बात 2010-11 की है। जब मुझे अपने school से collage के बीच का सफर तय करना था।

उससे पहले मैं अपने बारे में बता दूं, मैं हिंदी माध्यम के school से पढ़ रहा था, और दुर्भाग्य से मेरे season के बच्चो के लड़कों को लड़कियों से अलग क्लास में बैठाया जाता था।

ये बात बतानी इसीलिए जरूरी थी ताकि आप समझ सके के मेरा confidence किस हद तक कम रहा होगा।

बारहवीं को मैंने physics, chemistry और biology से first devision से पास किया।

जैसा हर मेडिकल के बच्चे को उम्मीद रहती है, मैन अपने मेडिकल की परीक्षा के drop liya, घर का इकलौता लड़का होने के कारण मुझे घर से दूर bhopal में पड़ने भेजा गया।

एक coaching में करीब आधा लाख fees भरने के बाद मुझे coaching में बैठने की अनुमति मिली।

अब यहाँ से मुझे ठगा हुआ सा महसूस होने लगा था। सबसे पहले तो पढ़ाई पूरी तरह english में होती थी। जैसे title के नाम english में, चीजों के नाम इंग्लिश में और यहाँ तक कि हमे इंग्लिश में ही theory लिखने को बोला जाता था।

मैं और मेरे जैसे कई हिंदी माध्यम के बच्चे topic की जगह titlle को समझने में पीछे रह जाते और biology का topic कब खत्म हो जाता पता ही नहीं चलता। आखिर teachers को भी syllabus पूरा करवाना था ना।

हम अपनी कमजोरी को accept कर चुके थे।क्योंकि english तो हमारी weak थी ना, तो sir के पूछने पर हाँ ही बोलना पड़ता था और ना भी बोल देते तो कब तक बोलते ।

इसके दूसरा सदमा हमे लगा physics का, सबसे पहले तो maths से हमारी दूरी थी जिसने physics को लेकर हमारा ख़ौफ़ बनाया हुआ था और physics के लैक्चर में ही मुझे समझ आया के गुरु धोखा हुआ है हमारे साथ।

हमें school में बड़े बड़े derivtion याद करवाए जते थे, कभी ओम का नियम कभी किरचोफ का नियम लेकिन वहाँ जा कर हमें पता चला के इनमे value put करके answer निकलने है, किस equation का use कहा होगा ये तो हमे आता ही नही था, और हमसे उम्मीद की जाती थी के कब कोनसा formula use होगा हमे तुरंत जवाब देकर answer देना हैं।

तब मुझे समझ आया के हमसे उम्मीद की जाती है के collage में आने तक आपको इन सब नियमो का उपयोग आना चाहिए, मतलब हमसे जो करवाया गया वो तो सिर्फ knowledge के लिए था और अचानक से हमे critical hypothetical situations को solve करना है।

यही हाल chemistry में भी रहा चीजें school की पढ़ाई से बोहोत दूर थी।

सुबह 7 बजे local बस से coaching दोपहर 1 बजे तक उसके बाद खाली coaching में 5 बजे तक पढ़ाई अगले बच्चों के आने तक, फिर city bus से घर पहुच कर खाना बनाना खाना फिर रात में पढ़ना।

दिसंबर के बाद coaching में सिलेबस खत्म और creash corse शुरू

exam जून तक नही होने के कारण दिसंबर से लेकर exam तक दिन रात पढ़ाई करीब 6 महीने तक दिन भर में 100 मीटर से ज्यादा नहीं घूमना, एक कुर्सी पर बैठे रहना उसी को अपना घर बना लिया हो जैसे , general के cutoff से करीब 50 नंबर कम आने की वजह से मेरा पहला ड्राप waste हो गया और मैंने exam के बाद शायद july में मैंने घर का रुख कर लिया 🙂

अभी ये शूरुआत थी………।

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Note :- Now In Hindi
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कहानी जातिवाद की…

hello दोस्तो,

आज मैं जातिवाद को एक कहानी के माध्यम से समझाने की कोशिश कर रहा हूं,

अगर आप इस कहानी को पहचान पाए तो कमेंट में मुझे बताएं मैंने किस कहानी से जातिवाद की तुलना की हैं।

एक बिंदु को शुरुआत मानते हुए कहानी शूरू करते हैं।

दो भाई जिनमे से एक का नाम दलित और दूसरे का नाम सवर्ण था

सवर्ण को उसकी बुद्धि की वजह से ज्यादा स्नेह प्राप्त हुआ

जबकि दलित को हमेशा ही उसकी कमजोरियों की वजह से अलग रखा गया

1—-

उस वक्त बीमारियों, प्रलय, पोलियों आदि के डर से गंदगी में काम करने वाले दलित भाई को साबुन, दवाओं की कमी से जूझ रहे सवर्ण भाई ने, दलित भाई से दूरी बना ली।

2—-

जब हर तरफ सवालों, अपने अस्तित्व, चीजों के व्यवहार और जिज्ञासा का दौर आया तब सवर्ण भाई ने अपनी बुद्धि से डर का व्यापार शूरू किया

सवर्णो के जवाबो ने सवर्णो को एक सम्मान का पद दिला दिया

जब सवर्णो की कहानियों और बुद्धिमानी का डंका बज रहा था, तब उनसे निरोगी रहने का रास्ता पूछा तो सवर्ण ने सफाई से रहने के नियम और गंदगी से दूर रहने की सलाह दी

3—-

सवर्ण भाई की इस सलाह से नासमझ दलित भाई को जो कि सफाई का काम करता था या जिसके काम को साफ नही माना जाता था, उससे दलित भाई हमेशा दुत्कारा गया

4—-

वक़्त बदला सालों से भेदभाव झेल रहे दलित भाई के मन में अत्याचार लावा बन कर धधक रहा था

जब दोनों भाइयों की संतानें हुई तो सवर्ण भाई के पुत्र उस भेदभाव से अनजान थे

वही दलित की संतान अपना खोया हुआ सम्मान पाना चाहती थी

5—

जब जब खुद को साबित करने का वक़्त आया तब दोनो ने अपनी अपनी प्रतिभा दिखाई

दलित पुत्र ने अपने पिता पर हुए अत्याचार और भेदभाव का वास्ता दे कर अतिरिक्त लाभ लिया

सवर्ण पुत्र को इसका एहसास था और उसने कुछ ना कहते हुए अपनी अलग दुनिया बनाई

वक़्त अपनी रफ्तार से चलता रहा सवर्ण पुत्र जो अपनी बुद्धि और माहौल के कारण सम्मानीय था, दलित पुत्र को अपने पिता के अत्याचार की कहानियां सुना कर उसके मामा ने दलित पुत्र के मन मे भी उसके पिता के अत्याचार का बदला लेने का बीज बो दिया।

6—–

जब कभी दलित पुत्र, सवर्णो की नगरी में गया तो सवर्णो द्वारा बनाए गए संसार में कुछ गलती करने के बाद उपहास का पात्र बना

लेकिन दिल मे बसी नफरत के कारण उसने इसे अपनी बेज्जती मान कर इसका बदला लेने का विचार बना लिया

7—–

जब बात हक की होने लगी तब अपने पिता का वास्ता, माहौल और वीरसती साधनों की कमी की कमी बता कर हमेशा, हर जगह सवर्ण पुत्र से अधिक लाभ लेने लगा

8——

काफी समय तक ऐसे ही लाभ लेने के बाद भी दलित भाई का बदला पूरा नही हुआ था वो सवर्ण से आगे खुद को देखना चाहता रहा

उसने अपने मामा के साथ कई तरह की चाल चल कर हर जगह सवर्ण को उनके हक से दूर रखा……

यहाँ भेदभाव की कहानी को आज तक निरंतर मान कर आज की परिस्थितियों से जोड़ कर देखे

अगर आप इस कहानी को पहचान गए हो तो मुझे बताए, अगर नही पेहचान पाए हो तो पूछ लीजिये

ये कहानी काल्पनिक हैं, इसे बस एक महाकाव्य से जोड़ने की कोशिश की हैं, मेरा उद्देश्य किसी की भावनाओ को ठेस पहचान नही है, और मैने सच को परोसने की कोशिश की हैं

इस जातिवाद का अगर अंत चाहते है। तो जातिवाद को ही खत्म करना पड़ेगा

एक बराबरी का स्तर ले कर बदले की भावना को खत्म करना होगा, अन्यथा इसके अंत मे ऐसा युद्ध होगा के मिट्टी को भी अपना रंग बदलने पड़ जाएगा 🙏

Opposite side of the Coin

मुझे इसीलिए भी ये दुनिया अच्छी नहीं लगतीं

अखबारों मे अच्छी से ज्यादा बुरी खबरें पड़ता हु

मै समाज के उस वर्ग का प्रतिनिधित्व करता हूँ

जो समय पर अपने बिजली बिल भर देता है

लेकिन उसका एक दिन का भी बिल माफ नहीं होता

जो समय पर अपना टेक्स भरता हैं

किन्तु उसे इसमे छूट नहीं मिलती

जिसे हर जगह सामान्य बोल कर अलग कर दिया जाता हैं

किंतु मै इस असामान्य व्यवहार के लिये शिकायत नहीं करता

जिसने कभी किसी को उनकी जाति से नहीं पारखा

किंतु उसे हर वक़्त उसकी जाति देख कर पुनः प्रयास को केह दिया जाता है

जो अपना वोट वक़्त पर देता है

किंतु उसकी भलाई के लिये कोई कानून नहीं बनता

जो बहन बेटियों के आरोपियों को कानून को सोप देता है

किंतु कानून उन्हे सालों तक बिरयानी खिलाता है

जो कानून के रखवालों पे भरोसा करता हैं

किंतु कानून भूखमरी में चंद पैसों मे बिक जाता हैं

जो अपने निजी मामलों में कानून हाथ में नहीं लेता है

किंतु कानून सालों का वक़्त और पैसा लेकर उन्हे इस काम का इनाम देता है

*अगर किसी को फायदा सिर्फ इसलिए दिया जा रहा है के उनके पूर्वजों पर अत्याचार हुए हैं?

तो महिलाओ को उनका हक लौटाने में हमारी पीढ़ीया गुजर जाएंगी…….

*अगर पिछड़ापन फायदा पहुचाने की वजह है तो जाति को क्यू देखा जाता है?

*अगर आर्थिक नजरिए से देखा जा रहा है तो बंगले मे रहने वाला इसका लाभ क्यू ले रहे है?

*अब जो इसकी वजह से पीछे हो रहे है क्या वो भी ऐसा ही करें?

*इस लाभ को कितने वक़्त तक ऑर दिया जाएगा?

*जिनको इससे लाभ मिल चुका है क्या उन्हे अब सूची से अलग कर देना नहीं चाहिए क्या?

*एक दूसरी तरफ खडे हो कर समाज का हिस्सा बनने के लिए ये कैसी चाल है?

*अगर ये ऐसा ही चलता रहे तो क्या हमे इस भेदभाव को करते रहना चाहिए?

*यह निरंतर लाभ मानसिक हताशता ऑर विकलांगता को पैदा नहीं कर रहा हैं?

IPL रिश्तो का 🙂

इस पोस्ट में मैं एक सोच को साझा कर रहा हु। मैं समझता हु समाज में इस तरफ भी बदलाब हो और ऐसी सोच का और ऐसे सोच वालो को स्वीकार किया जा सके

IPL एक ऐसा मंच जिसमें विभिन्न देशों के खिलाड़ी एक झंडे के नीचे खेलते है…

क्या ये मुमकिन है। के दो इंसान समान या असामान वर्ग और लिंग के एक साथ रहे या अपना जीवन साथ गुजारे? और इससे किसी को कोई आपत्ति ना हो?

हर इंसान अपने आप में अलग है। हर इंसान हर परिस्थिति में अलग वर्ताव करता है। तो फिर किसी भी इंसान को हर परिस्थिति में किसी एक इंसान के साथ रहने पे मजबूर क्यों किया जाता है।

जिसे हम साधारण भाषा में शादी कहते है.. ये शादी ना होकर एक गले का पट्टा है, एक बंदिश है …. जब तक आप खुश है, आप इसके अंदर रह लेते है। लेकिन किसी परिस्थिति में अगर कुछ आसामान्य घटना हो जाती है। तब यही पट्टा आपको कहीं जाने आने भी नही दे सकता, भले ही पट्टे में कुछ चुभता हो या घर में आग लगी हो आपको सहना पड़ेगा ।

मैंने अक्सर देखा है। औरतों पे उनका पति ज़ुल्म करता है। लेकिन पत्नी उस पटटे के कारण न कही जा सकती है और न ही भाग सकती है।

जैसे IPL के मैच में किसी भी देश का खिलाडी किसी टीम का हिस्सा बन जाता है और जब तक वो चाहे तब तक उसका हिस्सा रहता है

क्यों न ऐसे ही हम किसी के भी साथ दोनों की मर्ज़ी से जब तक चाहे साथ रहे

क्या जरूरत है किसी tag की…

मुझे पता है क्या क्या आप सोच रहे होंगे और कैसे कैसे सवाल आपके दिमाग में उठ रहे होंगे

कुदरत ने बच्चा पैदा करने की शाक्ति सिर्फ औरतों को दी है। तो वो अपने बच्चे को जिसके साथ रखना चाहे रखे और सरकार ऐसे वर्ग को समाज में आगे रखे….

सब एक दूसरे की जरूरत है। और एक दूसरे के बिना मनुष्य जैसे सामाजिक प्राणी का जीवन संभव नही है। तो अगर ये बात आम हो जाए तो लोग अपनी छोटी मानसिकता से ऊपर उठेंगे।

और आज़ादी का सही मायनों में दुरुपयोग नही होगा, तब हम प्यार और ज़िन्दगी में नयापन महसूस कर सकेंगे

शायद मैं गलत हो सकता हु अपने विचार मुझे बताए

और हां मैं शादी से त्रस्त नही हु ना घर पर शादी की बातों से परेशान 😂😂😂😂

इसे personal ना करे 😉🙏

सोच का अंतर

अभी कुछ दिनों पहले हमारे whatsapp group में एक शायरी आई जो इस प्रकार थी

“इंसान को अपनी नज़र में सही होना चाहिए

वरना दुनिया तो भगवान से भी दुखी है।”

ये शायरी सुनने में जितनी अच्छी लगी इतनी ही ज्यादा मैंने इसके बारे मे सोचा। असल मे ये हमारे दैनिक बोलचाल में बार बार आने लगी… तो मैंने इसपे ज़रा ध्यान दिया

अगर सभी अपनी नज़र में सही हो जाए तो? प्रश्न साधारण हैं लेकिन ये किसी की सोच बदल भी सकता है। अगर सभी अपनी खुद की नज़रों में सही है तो गलत कोन होगा। और इससे गलत काम करने वालो को रोकने की बात कोन करेगा

अगर सभी अपनी अपनी नज़र में सही हैं तो वो बलात्कारी आदमी भी गलत नही करता है.. क्योंकि उसे ये लगता है सभी लड़कियां बदचलन है या लड़कियां इस्तेमाल की चीज़ है। इसी तरह वो आतंकवादी भी अपनी नज़र मे सही है क्यूंकि उन्हें ये पता है। के इससे उन्हें जन्नत मिलेगी और यह अच्छा काम है। अब मैं अपना प्रश्न दोहराता हु “क्या सभी को अपनी नज़र में सही हो जाना चाहिए?”

मेरा मानना यह है। के इंसान की फितरत होती है वो हर काम करने के बाद उसके परिणाम से खुद के लिए कहानियां बना कर खुद को संतुष्ट कर लेता है। यहां एक दृटिकोण का अंतर आ जाता है।

अगर आपके किसी काम के लिए कोई टोक दे तो हम अड़ कर बात टाल देते है। हमे यहाँ बात को सुनने की जरूरत हैं। अपना तर्क देते हुए इस पर बात करनी चाहिए उससे ही जो आपको टोक रहा है। और हां आप गलत हो ये मुमकिन है। तो आप बहस की वजय बात करे ।

मैं खुद से विचार करके काम करता हु। मैं कुछ बातों को खुद से पूछ लेता हूं जिसमे मुझे कुछ पल भी नही लगते है। वो कुछ बातें ये हैं:-

– क्या इससे किसी का नुकसान हो रहा है?

-क्या इससे बेहतर कुछ हो सकता है?

-क्या ये करना जरूरी है?

-अगर ये ना किया जाए तो क्या होगा?

-ये काम कर लेने के बाद मुझे अपना सर या अपनी आवाज नीची तो नही करनी पड़ेगी (self-respect)?

मैं एक स्वभिमानी इंसान हु। और कभी अपनी वजह से अपना या किसी का सर नीचा नही करवाना चाहता हु। ये कुछ पल की खुद से बात कोई बड़ा बदलाव तो नही ला सकती लेकिन इतना जरूर है। शायद ये आपको कल से बेहतर इंसान बनने में मदद जरूर करेंगी।

और हाँ मैं यहाँ गलत भी हो सकता हु.. मेरी सोच गलत हो तो आपकी राय का स्वागत है। ☺️