एक उम्र विश्वास करने की

एक बात मैंने हमेशा नज़र में रखी है। लगभग मेरे आस पास की हर लड़की को ये भरोसा होता है के वो भगवान की बोहोत खास है। और भगवान उसकी बातें या उसकी हर मुराद पूरी करते ही है।

मैं भगवान के होने ना होने की बहस से अलग बात कर रहा हु वह बात है विश्वास करने की उम्र की

मुझे ऐसा लगता है  जब हमे कुछ नही पता होता है उस वक़्त विश्वास का जन्म होता है।

जैसे कोई बच्चा अब समझ सकने या सीखने लायक हो जाता है। तब हमें उसे सीखना होता है  उस वक़्त उसके भीतर विश्वास होता है। जो उसे सीख मिलती है वह उसे विश्वास करके मान लेता है। 

बचपन के किन्ही मुश्किल दिनों में जब इनतजार की घड़ियां होती है। वो वक़्त उनके विश्वास को कम या ज्यादा करता है। लगभग उम्मीद के मुताबिक हर बार जो होता है। उसके हिसाब से हम अपना नजरिया बना लेते है।

इंसान में एक खूबी होती है। खुद को संतुष्ट कर लेने की वो जब तक संतुष्ट नही हो जाता अंत नही मानता ।

गलत बातो पर भी इंसान खुद को संतुष्ट करके गलत धारणाये बना लेता है। या उन्हें ही सच मानने लगता है।

ये बात मैंने मेरी पढ़ाई (compitition exams) के वक़्त समझी

हम गलत बातो के पीछे भी कहानिया बना कर खुद को सही समझ लेते है। शायद यही वो वक़्त है जब हम सही बातों को सुने ओर माने । यही वक़्त मतलब अभिज्ञता का वक़्त 

विश्वास का वक़्त

कुछ भी सत्य मान लेने से पहले सच पता कर लेना चाहिए एक जगह से नही एक से अधिक जगहों या दिमागों से 

धन्यवाद

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